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सोमवार, 6 अगस्त 2012

promo SAI MORE BABA

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

" SAI MORE BABA " Full Title Song

सोमवार, 26 मार्च 2012

मात्री प्रेम !!!


कुछ अनुभव वक्त के साथ ही होते  है .... 
आज मेरा बेटा का  12th का exm ख़तम हुआ ....
घर आते ही मैंने बेटे को बोली ..
चलो भगवान को प्रणाम  करते है ...
हम दोनों  मंदिर के पास पहुचे , ..
हाथ जोड़ भगवान को प्रणाम कर रही थी 
और मेरे आँखों  से अश्रु की धार ऐसे बहने लगा .....
मानो ,बोल रहा हो आज मुझे नहीं रुकना बहने दो 
तब याद आया की हमलोग को 
खुशियाँ मिलने पर बाबूजी क्यों रोते थे ... 
उस समय समझ नहीं पाती थी ...
आज मैं  बाबूजी के जगह हूँ  ...
शायद ! इसे ही मात्री प्रेम कहते है ..!!!

रविवार, 25 मार्च 2012

मत हो तू उदास ..!!!!!


जीवन है ....
चलते  तो रहना ही है
इस रौशनी की
चकाचौंध में ,


शायद!
नज़र न आऊं तुझे
मै जो खड़ी हूँ ,अँधेरे में !
ध्यान से  देखना ,


मेरी रूहें ,मेरा साथ
पकड़ खड़ी हैं  तेरा हाथ
मत हो तू उदास
सदा  हूँ , मै तेरे पास ...!!!!!



मंगलवार, 20 मार्च 2012

मत पूछना.....!!!!

मत  पूछना
मै  कहाँ  खोई  हूँ 
पता  तो  तुम्हे  भी  है 
ज़माने  से  कह  कर, क्या  करुँगी  , 
अगर  तुम  सुनोगे , तो  कुछ  कहूँगी  ...!!!


मंगलवार, 13 मार्च 2012

my favorite....ghazal ...:-)

रविवार, 4 मार्च 2012

जिंदगी की राह में.....!!!!



जिंदगी की राह में ,थोड़ी  परेशान हो गई हूँ ।
चलती  हुई जिंदगी में, पानी की धार हो गई हूँ ।।


मंजिल तो पता है, पर रास्ते से अंजान हो गई हूँ ।
जो भी राह मिली , उसी पर  ढुलकती चली जा रही  हूँ   ।।


जितने भी  मिले राह में गढ़े ,सबको भरती चली गई हूँ ।
पर अब और कितने गढ़े मिलेंगे? यह सोच थोड़ी  घबडा गई हूँ ।।
  
आशाओं  की सोपान पर , बस चढ़ती  जा रही हूँ ।
कभी तो पहुंचुंगी  मंजिल पर  ,यह सोच ,बहती जा रही हूँ ।।


जिंदगी की राह में ,थोड़ी  परेशान हो गई हूँ ।
चलती  हुई जिंदगी में, पानी की धार हो गई हूँ ।।


सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

नज़रिया ....!!!



       जब हमारा नजरिया सही हो ,तब हमें अहसास होता है की हम सब हीरों की खानों पर चल रहे है जो  अक्सर हमारे पैरो के निचे होते है ! हमें इसके लिए कही जाने की जरूरत नहीं है ! जरूरत है तो सिर्फ इसे पहचानने की .... आज मै आपलोगों को एक कहानी  सुनाती हूँ { आप लोग भी यह कहानी कहीं  पढ़े या सुने जरूर होंगे }.....
     
               अफ्रीका  में एक एक खुश और संतुष्ट किसान रहा करता था ! वह खुश था क्योकि  वह संतुष्ट था ! और संतुष्ट था इसलिए क्योकि वह खुश था .....! एक दिन उसके पास एक ज्ञानी व्यक्ति आया ,जिसने उसे हीरो की अहमियत और उनकी ताकत के बारेमे बताया ,ज्ञानी व्यक्ति ने कहाँ अगर तुम्हारे पास अंगूठे के जितना भी हिरा हो तो तुम अपना एक शहर खरीद सकते हो ,और अगर तुम्हारे पास मुठी के बराबर का हिरा हो तो तुम शायद  अपने देश के ही मालिक बन सकते हो ...... ऐसी बातें बता कर वह ज्ञानी चला गया ! उस रात  किसान बिलकुल ही नहीं सो सका !वह नाखुश  और असंतुष्ट हो गया था ! ....वह नाखुश था क्यों की वह असंतुष्ट था और असंतिष्ट था इसलिए वह नाखुश था ..!
          अगले दिन उसने अपने खेतों को बेचने का बंदोबस्त किया और हीरों की खोज में निकल पड़ा ..... पुरे अफ्रीका में वह घूमता रहा ,लेकिन कुछ न मिला सारे यूरोप का चक्कर लगाने के बाद भी उसकी खोज पूरी नहीं हुई ..! जब वह स्पेन पंहुचा तब तक वह भावनात्मक ,शारीरिक और आर्थिक कमी से टूट चूका था  ! उसका हिम्मत इतनी ज्यादा टूट गई थी की उसने बार्सिलोना नदी में कूद कर ख़ुदकुशी कर ली ...!!!
          उधर जिस व्यक्ति ने खेत ख़रीदे थे ,उसने नाहर के दुसरे किनारे पर सूरज की रोशनी जैसे ही एक पत्थर पर नजर पड़ी तो इन्द्रधनुष की तरह सात रंग जगमगा उठे ! उस वक्ती ने सोचा की यह पत्थर घर के बैठक में सजाने का काम आएगा और वह उसे उठा ले आया और घर में सजा दिया ! उसी दोपहर में ,वो ज्ञानी  व्यक्ति फिर वह आया ,उसकी नज़र उस जगमगाती पत्थर पर पड़ी ..तो उसने  पूछा की ,"क्या हाफिज वापस आ गया है ? तो नए मालिक ने जबाब दिया नहीं , लेकिन आप ऐसा क्यों पूछ रहे है ? तब गायनी व्यक्ति ने जबाब दिया ," वह सामने रखा पत्थर हिरा है " मै देखते ही पह्ता पहचान जाता   हूँ फिर नए मालिक ने कहाँ नहीं वह सिर्फ एक पत्थर है ,मैंने उसे नहर के पास से उठाया है चलिए मै आपको दिखता हूँ वहां ऐसे बहुत सारे पत्थर पड़े है !
             वे दोनों वह गए और पत्थर के नमूने उठा लाये और जाँच के लिए भेज दिए ! सचमुच में वो पत्थर हीरे ही थे ! उन्होंने पाया की उस खेत में दूर दूर तक हीरे दवे पड़े थे .....!!!

इस कहानी  से हम क्या सिखाते है ?
       
            जब लोग मौके को पहचान नहीं पाते है तो अवसर का खटखटाना उन्हें शोर लगता है .....एक मौका दुबारा नहीं खटखटाता ,दूसरा मौका अच्छा या बुरा हो सकता है , लेकिन वो नहीं होगा जो पहले था ... इसिलए सही समय पर सही फैसला  और सही नज़रिए को समझना बहुत अहमियत रखता है ....!!!!!

शनिवार, 7 जनवरी 2012

main गृहिणी हूँ !


मैं  गृहिणी हूँ !

एक समय ऐसा आता है

जब मैं , बिलकुल अकेली हो जाती हूँ

मुझे, किसी की जरूरत नहीं होती है

सब, अपने अपने में वयस्थ है

मेरे लिए किसी के पास समय ही नहीं

मैं  तो अभी भी,

सब का ख्याल उतना ही रखती हूँ

जितना पहले रखती थी .

मुझे तो अभी भी,

पति की टाइ और शर्ट मैचिंग है या नही

दिखा करती है .

बेटे ने बाल बनया,

पीछे का एक बाल खड़ा है

अपने आप मेरी हाथ उस तक पहुँचती है

और उसे सराहने लगती है

पर उन्हें क्यों नहीं दिखती है

मेरी सूजी हुई आँखें

तू रात में सोई नहीं क्या ?

मैं  किसी को दिखती नहीं हूँ

मैं  गृहिणी हूँ !

रोज उनके पास ही रहती हूँ

सबसे करीब!

उनका हर ख्याल रखती हूँ

छोटी से छोटी  बड़ी से बड़ी

इतना पास होते हुए भी,

उन्हें नहीं दीखता

मैं  कल क्या थी,

और आज क्या हूँ .

सब अपने में व्यस्त है

सुबह से उठ सब का ख्याल रख.....

सब अपने अपने में व्यस्त

घर खाली.....

और ...

अकेली मैं  कही थकी हुई ,

जा बैठती हूँ

चिंतन करती हूँ

मैं  क्या हूँ ?

मैं  जननी हूँ ,

मैं  बेटी हूँ ,

मैं  पतनी हूँ ,

मैं  माँ हूँ पर मै ?

मैं  क्या हूँ ?

मेरी पहचान क्या है ?

मेरा अस्तित्व क्या है?

बस इतना की मैं  गृहिणी हूँ !

फिर उठ !

सब आते ही होंगे

सोच उनकी खुशियों की तैयारीमें जुट जाती हूँ

मैं !!!! ,

क्योकि मैं  गृहिणी हूँ !!!!


.......साधना


बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

बसंत ऋतु आये ...!!!



हे री पाखी !
बसंत ऋतु आये
कैसे उन्हें बतलाये
वो है ऐसे बुद्धू,समझ न पाये !

मैं इतराती फिरू बावरी,
मद मस्त मादक सुगंध से भरी,
आलिंगन कर.....अब कैसे समझाये
बसंत ऋतु आये !

कंगन भी खनकाये,
पायल भी छंकाये,
पाती लिख भिजवाये
फिर भी वो समझ न पाये !

हे री पाखी !!
खिले सरसों के फूल,
बसंती हवा उड़ाए धुल,
सब देख हृदय में उठे शूल !

न कोयल की बोली,
न फागुन की होली,
कछु न सुहाये !
हे री पाखी! बसंत ऋतु आये !

अब कैसे करू इशारा,
तू ही लगे है मुझे प्यारा,
वो है ऐसे .......
न समझे कौनो इशारा !

हे री पाखी ! अब तो बैरन भई नींद,
व्याकुल हुए प्राण,
अब कौन सा छेडू तान !

हे री पाखी !
अब तू ही बता,
सब कर अब मनहारी
क्या मै करू... उन संग बलहारी.....???

साधना ::--

रविवार, 30 जनवरी 2011

क्या तुम्हे पता है .... ?


देखा तुझे तो ऐसा लगा
तुम से भी खूबसूरत
तुम्हारा अंदाज़ है !
कहते हो सम्भालो
कैसे सम्भालूँ मैं ,
अब ,तुम ही बता दो ?
इसी अदा पे तो मर-मिटी थी मैं
यही तो ,सदियों पुराना राज़ है..
क्या तुम्हे पता है .... ?

साधना ::---:

बुधवार, 26 जनवरी 2011

एक बात बोंलू!!!


एक बात बोंलू
अगर इज़ाजत हो तो...

जी

आज मुझे कुछ देना है
आँखें बंद कीजिये
.
;
मिला क्या ?

बुधवार, 19 जनवरी 2011

देखो न !!!!


देखो न !
धड़कने बढ रही है
सांसे तेज हो रही है
ऑंखें बंद हो रही है
मै शिथिल पड़ रही हूँ

ये कैसा डोर है
जो मुझ तक
तेरी हर आहट
को पहुंचा जाती है

ये कौन सा बंधन है
मै तो मुर्ख हूँ
तू तो ज्ञानी है
मुझे समझा दो न ..!!!

साधना ::--

सोमवार, 17 जनवरी 2011

एक चिट्ठी रश्मि दीदी के नाम !!!!



नमस्कार दी !!
दीदी मै आपकी ब्लॉग पे रोज़ आती हूँ !मुझे आपकी ब्लॉग एक"गीता"की सारांश जैसी दिखती है !कहते है न की हर समस्या का हल "गीता" में लिखा होता है !उसी तरह मुझे आपकी रचनायें दिखती है !
मुझे जब भी कोई परेशानी हुई है ,मै आपकी रचनायें पढ़ती हूँ और हमेशा मुझे अपने सवालों का जबाब मिल जाता है! मुझे हमेशा एक सकारात्मक शक्ति मिलती रही है आपकी रचना से !
दीदी, फिर आप सोचती होंगी की मै टिप्पणी क्यों नहीं देती हूँ ...मुझे ऐसा लगता है कि मै आपकी रचना की समीक्षा करू.... इतनी काबिल नहीं हूँ मै इसीलिए बिना कुछ लिखे वापस आ जाती हूँ ..दिल से आपको शुक्रिया कहती हूँ ..!!

आपकी छोटी बहन
साधना :::--

रविवार, 16 जनवरी 2011

हे कृष्ण !!!!


ये ख्वाब है
या हकीकत !
शब्द भी खामोश हो
छुप गए है कही
शायद !

उन्हें भी डर है
टूटने का
तेरी डांट से ,
अगर ये ख्वाब भी हो
तो भी मुझे छोड़ देना
ख्वाब में ...
जगाना नही

पूरी जिन्दगी ......
यूँही तेरे सजदे के
ख्वाब में ...
जीना चाहती हूँ ...!!!

--::साधना ::--

शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

बूझो तो जाने !!!!


एक चेहरा मुझे भाता है!
जो मेरे दिल पे
राज़ करता है!
जनवरी के महीने में
उनका जन्म होता है!
यूँ तो उनकी हर
चीज़ है आली,
पर गाल में पड़े
मुहासों के गड्ढे
वो मेरी, सबसे है प्यारी !!!!
--:: साधना ::--

गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

इस बार मत भूलना .....!!!


सुनो न ..!
समंदर के पास चले ?
थक गये हो घर परिवार ,समाज
सब का फिक्र कर के
ये तो मुझे पता है ..
तुम हर फिक्र को धूएँ में
उड़ाते चले गए !
पर फिर भी ...
समंदर के सैर करते है
लहरों को गिनते है
बड़ो का मुखौटा उतार
बचपन को जीते है


चलो रेत का घर बनाते है
तुम अपना पॉंव रखो
मै रेत का ढेर रखती हूँ
नहीं रहने दो ..
जब रेत रख थप-थपाऊँगी
तुम्हे दर्द होगा
ये कैसे मै सह पाऊँगी
मै पॉंव रखती हूँ ,
पर नहीं ,
तुम भी तो मेरा दर्द नहीं सह पाते हो
रहने दो अपना अपना बनाते है
ऐसे भी तो ...

छोड़ो ,लहरों को गिनते है
देखे कौन कितना गिन पाते है
खामोश क्यों हो ?
ओह! समझ गई !
डरते हो न की कही आगे पीछे
न हो जाये ..
हाँ मुझे भी डर लग रहा है
कही हम आगे -पीछे हो
हाथ न छुट जाएँ


छोड़ो रहने दो !
पास पास बैठते है
सुख-दुःख बाँटते है
ओह ! ढंडी हवा ,
चादर !भूल गए ..?
ठीक ही हुआ भूल गये
इसी बहाने..
एक ही चादर ओढेंगे....
तुम्हारे और पास आ पाएंगे
अब क्या रेत और क्या लहरों को गिनना


अब तो सांसों से
सांसें मिलने लगी है
जिंदगी फिर से
लहरों पे उतरने लगी है
बहुत देर हुआ अब चलेंगे
फिर यही आकर मिलेंगे
पास- पास बैठ दुःख सुख बाँटेंगे ....
पर सुनो सुनो सुनो ...
इस बार मत भूलना .....!!!
.....साधना ::-

मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

बुद्धू कुछ तो ....


एक खूबसूरत सा एहसास

बार बार आ रही है मेरे पास

एक गहरी साँस ले

एहसासों को बटोर

दामन से गठरी बांध

रख ली मै

अपने पास

अब ये मत कहना

क्यों रखी मै अपने पास

बुद्धू कुछ तो ......

समझ रखो अपने पास ...!!

......साधना::-

सोमवार, 20 दिसंबर 2010

संभल कर पांव रखना ....!!


सुनो न !

थोड़ा आहिस्ता चलो

संभल कर पांव रखना

धीरे - धीरे डर लगता है

कांच के ख्वाब है कहीं,

टूट के बिखर न जाएँ ...!!!

....साधना

रविवार, 12 दिसंबर 2010

सुनो न ! कुछ तुमसे है कहना...!!!


सुनो न !
कुछ तुमसे
है कहना
थोड़ा पास आना
थोड़ा और...
तुझे ले चलती हूँ
दूर गगन के छाँव में
जहाँ इस दुनियां की
कुछ भी साथ न हो
बस हम और तुम
आँखें बंद करना !
अपना हाथ
मेरे हाथ में देना
देखो, ठीक से
छोड़ना मत
ये लो ! आ गये
कितनी खुबसूरत
वादियाँ है
फिज़ा है
देखो !
हमारे पास आ रही है
न गम है
न आँसू है
बस हम-तुम
और हमारी रूहें
आँखें बंद रखना
अब तो.....
न जमीं रहा
न आसमां रहा
बस इश्क़ ही इश्क रहा ...!!!

आगे ......???
उफ़ आगे क्या
धड़ाम सा निचे गिरना
नींद का खुलना
और फिर वही मतलबी
दुनियां में आ जाना !!!!!

~~~~ साधना :-