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मंगलवार, 12 जनवरी 2010

ओ मन मोहना !!!



मन मोहना !,
भोर हुई !
फिर क्यों बंद है तेरे द्वार ,
जिस में सपने मेरे हजार

तुम नव किरणों के संग हो लो ,
तू अब अपना द्वार खोलो ,
मन मोहना !

मै हूँ तेरी मोहनी
सुन रे ! अपने प्रेम को
मै ही हूँ , तेरी रागिनी
फिर क्यों ?
भिगोये मेरे नयनों को ,

मन मोहना !
भोर हुई !
फिर क्यों बंद है तेरे द्वार ,
जिसमे मेरे सपने हजार !!!!!!!



5 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... ने कहा…

radha kaho yaa meera....mohan kholo dwaar, mann kee nadi adamya lahron sang baithi hai aas lagaye

kshama ने कहा…

Gantantr diwas kee ank shubhkamnayen!

Rakesh ने कहा…

ओ मन मोहना !
भोर हुई !
फिर क्यों बंद है तेरे द्वार ,
जिसमे मेरे सपने हजार !
sadhna
wah
mein aksar keh reha hun ye samay wo samay hai jab her mukh se prem kavitayen nikalni chahiye ..aur mein khush hun sab ore dekhker
..wakai aapne es pradushit vatavaran mein ape vishudh prem ki kavita likhler vatavaran nko saaf kiya hai ....dhanyawad

kshama ने कहा…

Bahut,bahut sundar rachana!

राकेश कौशिक ने कहा…

"ओ मन मोहना!,
भोर हुई!
फिर क्यों बंद है तेरे द्वार ,
जिस में सपने मेरे हजार"
पंक्तियाँ विशेष लगीं - आभार

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